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हूं बदले जब क्षेत्र निवास आंखें हृदय अवधारणा प्रभाव बदलेगा ठांव जलती मीन छोड़ दी चुका आप्रवासी आशा प्रवास छोड़ जाते उत्प्रवासी छोड़ विवेकशीलता संग नियोजन गेह बन जाती है मोती

Hindi छोड़ गेह निज Poems